पुष्यमित्र शुंग: एक ऐसा ब्राम्हण योद्धा जो न होता तो भारत यूनानी यवनों का गुलाम बन गया होता (भाग-2) - News Adda India

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पुष्यमित्र शुंग: एक ऐसा ब्राम्हण योद्धा जो न होता तो भारत यूनानी यवनों का गुलाम बन गया होता (भाग-2)

 भाग-1 से निरंतर




सम्राट पुष्यमित्र का जन्म ईसा से भी 185 वर्ष पहले का है. जाहिर है कि इतने पुराने काल के ऐतिहासिक दस्तावेज उस स्वरूप में तो नहीं मिलेंगे जैसा अंग्रेजों के काल के ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं. लेकिन फिर भी उस दौर में संस्कृत में लिखे ऐसे ग्रंथ आज भी मौजूद हैं, जो कई ऐतिहासिक घटनाओं की पुष्टि करते हैं. प्रसिद्ध विद्वान वाणभट्ट द्वारा लिखित हर्षचरित में स्पष्ट उल्लेख है कि पुष्यमित्र शुंग ने किन परिस्थितियों में सम्राट बृहद्रथ की हत्या की. 

इसके अलावा महर्षि पतांजलि के द्वारा लिखित महाभाष्य ग्रंथ में भी सम्राट पुष्यमित्र और शुंग राजवंश के बारे में काफी जानकारी मिलती है. महाकवि कालीदास द्वारा लिखित मालविकाग्निमित्रम वैसे तो मालवदेश की राजकुमारी मालविका और सम्राट पुष्यमित्र के पुत्र अग्निमित्र के प्रेम की कहानी है, लेकिन इस नाटक से भी शुंगों और पुष्यमित्र का काफी जिक्र है. इसके अलावा गर्ग ऋषि द्वारा लिखित गार्गी संहिता और मत्स्य पुराण में भी सम्राट पुष्यमित्र शुंग का वर्णन आता है. लेकिन हिंदू धर्म के विरोधी (वामपंथी) इन सभी ग्रंथों को दरकिनार कर केवल दिव्यावदान नाम की पुस्तक का ही जिक्र करते हैं. ये पुस्तक बौद्ध धर्म के अनुयाईयों ने लिखी है जिसमें पुष्यमित्र शुंग को बौद्धों का हत्यारा बताया गया है. कई इतिहासकारों का मानना है कि दिव्यावदान में घटनाओं का अतिश्योक्तिपूर्ण वर्णन है.

आखिर क्यों की पुष्यमित्र ने राजा बृहद्रथ की हत्या..

खैर, हम लौटते हैं फिर से सम्राट पुष्यमित्र की कथा पर. बौद्ध मठों में छिपे हुए यवन सैनिकों का पुष्यमित्र व उनकी सेना ने बड़ी वीरता व चतुराई से वध कर दिया, लेकिन सम्राट बृहद्रथ को सेनापति पुष्यमित्र का ये कदम भी गंवारा नहीं था. वृहद्रथ को लगा कि पुष्यमित्र के इस कदम से डेमेट्रियस नाराज हो जाएगा. बृहद्रथ के सहयोगियों ने उन्हें सलाह दी कि वे सेना के अवलोकन के लिए जाये और वहां पुष्यमित्र को गिरफ्तार कर दंड की घोषणा कर दे. यही नहीं पुष्यमित्र द्वारा जो सेना गठित की गई है उसे भंग कर दे. इससे डेमेट्रियस प्रसन्न होकर बृहद्रथ मित्रता स्वीकार कर लेगा. भले ही सत्ता डेमेड्रियस के हाथ में चली जायेगी लेकिन युद्ध टल जायेगा.   

पुष्यमित्र को इसका पता चल गया. अब सम्राट के प्रति उसकी निष्ठा का स्थान क्रोध ने ले लिया. उन्होंने सोचा कि वह पूर्ण समर्पण भाव से अपनी मातृभूमि और राष्ट्र को बचाने का हर संभव प्रयत्न कर रहा है और उसका राजा उसी को कैद कर विदेशी आक्रांता के सामने घुटने टेक रहा है. ऐसे में पुष्यमित्र के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा. मगध राज्य और उसकी प्रजा को एक थाली में सजाकर डेमेट्रियस को सौंपना उसे कतई मंजूर नहीं था. आखिरकार उसने विद्रोह कर सत्ता के सूत्र अपने हाथ में ले लिए और बृहद्रथ को मृत्युदंड दे दिया.

डेमेट्रियस से भीषण युद्ध व अश्वमेध यज्ञ... 

अब सेनापति पुष्यमित्र शुंग मगध के सम्राट बन चुके थे. लेकिन उन्हें मालूम था कि राजसिंहासन पर बैठने का अर्थ राष्ट्र की सुरक्षा करना होता है. यवन आक्रांता डेमेट्रियस कौशाम्बी तक पहुंच चुका था. डेमेट्रियस से पाटलिपुत्र की रक्षा करना सम्राट पुष्यमित्र के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी. इसी दौरान पुष्यमित्र को समाचार मिला कि डेमेट्रियस ने अपनी आधी सेना के साथ साकेत (वर्तमान अयोध्या) पर आक्रमण कर दिया है. युद्ध नीति में पारंगत और शूरवीर पुष्यमित्र समझ गए की डेमेट्रियस को सबक सिखाने का यही मौका है. सम्राट पुष्यमित्र ने अपनी सेना को दो भागों में बांट दिया. सेना की पहली टुकड़ी ने साकेत पर हमला करने गई डेमेट्रियस की सेना पर दूसरी ओर से हमला कर दिया. डेमेट्रियस की यवन सेना साकेत और पुष्यमित्र की सेना के बीच फंस गई. दोनों ओर से हुए आक्रमण के कारण यवन सेना के ज्यादातर सैनिक मारे गए. 

पुष्यमित्र शुंग और उनकी सेना के पराक्रम के चलते डेमेट्रियस को उल्टे पांव भागना पड़ा

पुष्यमित्र की सेना की दूसरी टुकड़ी ने कौशाम्बी में बैठे डेमेट्रियस पर हमला कर दिया. बृहद्रथ के नेतृत्व में मगध हमेशा डेमेट्रियस के सामने संधि और मित्रता के लिए हाथ जोड़े ही खड़ा रहता था. ऐसे में मगध की ओर से कोई आक्रमण हो सकता है, इसकी कल्पना भी डेमेट्रियस को नहीं थी. पुष्यमित्र शुंग और उनकी सेना के पराक्रम के चलते डेमेट्रियस को उल्टे पांव भागना पड़ा. पुष्यमित्र शुंग का आक्रमण इतना विराट व नियोजित था कि डेमेट्रिस को हिन्दुस्तान छोड़कर ही भागना पड़ा. इस युद्ध से भारत में शुंग राजवंश की पकड़ इतनी मजबूत हो गई कि यवनों ने भारत पर फिर से कोई आक्रमण नहीं किया.

 इसके बाद सम्राट पुष्यमित्र ने राज्य को आर्थिक, सामाजिक व सुरक्षा की दृष्टि से मजबूत बनाने के लिए कई कदम उठाए. इसमें से सबसे अहम अश्वमेघ यज्ञ था. महर्षि पतांजलि की प्रेरणा से सम्राट पुष्यमित्र ने विशाल अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन किया. तत्कालीन भारत के सभी छोटे-बड़े राजाओं ने योग्य व कुशल पुष्यमित्र को चक्रवर्ती सम्राट बनने में सहयोग किया. सम्राट पुष्यमित्र ने सत्ता के सभी सूत्र अपने हाथ में न रखते हुए सत्ता का विकेन्द्रीकरण भी किया. उसने अपने पुत्र अग्विमित्र को विदिशा का उपराजा बनाया और सत्ता संचालन के सूत्र उसके हाथ में दिए. विदर्भ पर आक्रमण कर उसे अपने आधीन कर माधवराव को वहां का राजा बनाया. इस प्रकार से पुष्यमित्र शुंग की चतुराई और वीरता के कारण भारत यूनान से आए यवनों का गुलाम होने से बच गया. शाकल(वर्तमान सियालकोट, पाकिस्तान) से लेकर कावेरी नदी तक शुंग राज्य की सीमाएं फैल चुकी थीं.


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