पुष्यमित्र शुंग: एक ऐसा ब्राम्हण योद्धा जो न होता तो भारत यूनानी यवनों का गुलाम बन गया होता (भाग-1) - News Adda India

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पुष्यमित्र शुंग: एक ऐसा ब्राम्हण योद्धा जो न होता तो भारत यूनानी यवनों का गुलाम बन गया होता (भाग-1)



 आज पूरी दुनिया में हिन्दू धर्म को मानने वालों की संख्या 1 अरब से ज्यादा है. विश्व जनसंख्या में 14 फीसदी हिस्सेदारी हिन्दुओं की है और सनातन हिन्दू धर्म संख्या के लिहाज से दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा धर्म है. इस्लाम और ईसाई धर्म को मानने वालों की तादाद भले ही हिंदुओं से ज्यादा हो, लेकिन गौरतलब है कि हिंदू धर्म का प्रसार कभी तलवार के जोर पर नहीं हुआ. दूसरे मजहब मानने वालों को किसी तरह का लालच देकर धर्म परिवर्तन करवाना भी हिंदुत्व की फितरत में नहीं है. दूसरे शब्दों में कहें तो सनातन को मामने वालों ने किसी डर या लालच के चलते हिन्दू धर्म नहीं अपनाया. इसके बावजूद आज दुनिया में तीसरी बड़ी संख्या हिन्दू यानी की सनातन धर्मावलंबियों की है. 

कौन थे पुष्यमित्र शुंग...

आज आपका परिचय एक ऐसे वीर और पराक्रमी हिन्दू योद्धा से करवाएंगे जो यदि भारतवर्ष में जन्म न लेता तो शायद हिन्दू धर्म भी इस गौरवशाली स्वरूप में न होता. हम बात कर रहे हैं ईसा से 185 साल पहले जन्मे अद्भुत पराक्रमी पुष्यमित्र शुंग की. पुष्यमित्र शुंक का वर्णन मौर्य काल के अंतिम दौर में एक राजपुरोहित के पुत्र और सेनापति के रूप में होता है. भारत में शुंग राजवंश की स्थापना का श्रेय इन्हीं को जाता है. वैसे तो वामपंथी इतिहासकर पुष्यमित्र शुंग पर ये आरोप लगाते रहे हैं कि उन्होंने अपने ही राजा बृहद्रथ की हत्या कर राज सिंहासन हासिल किया था, लेकिन यहां ये भी समझना जरूरी है कि ये सारी घटनाएं कैसे और क्यों हुई. ये समझने के लिए आपको सम्राट पुष्यमित्र शुंग के जन्म से पहले मौर्य काल में जाना होगा. 

आचार्य चाणक्य ने जिस अखंड भारत का सपना देखा था उसे चंद्रगुप्त मौर्य ने पूरा कर दिया था. चंद्रगुप्त मौर्य के बाद उनके पुत्र बिंदुसार और उनके पश्चात् सम्राट अशोक राजा बने. पराक्रमी अशोक ने भारत की सीमाओं का अभूतपूर्व विस्तार किया, लेकिन कलिंग के युद्ध में हुए भीषण रक्तपात के बाद सम्राट अशोक का ह्रदय परिवर्तन हो गया. उन्होंने हिंसा का मार्ग पूरी तरह से त्याग दिया और बौद्ध धर्म के अनुयाई बन गए. उन्हों शेष जीवन बौद्ध धर्म के प्रचार में व्यतीत किया. सम्राट अशोक की मृत्यु के बाद मौर्य काल के बाकी राजाओं ने भी अहिंसा की नीति ही अपना रखी थी. जाहिर है कि सेना का महत्व भी धीरे-धीरे कम होने लगा. अहिंसक नीति के चलते राजा ने कर न चुकाने वालों को दंडित करना भी बंद कर दिया था. हालत ये हो गई कि राज्य में कर वसूली की भी कोई प्रभावी व्यवस्था नहीं रह गई. राजकोष तेजी से रिक्त होने लगा. अशोक और उसके बाद के मौर्य राजाओं ने बौद्ध मठ और स्तूपों को बनाने के लिए भी राजकोष खोल दिया था. ऐसे में राज्य की आर्थिक व सैन्य स्थित बहुत ही कमजोर हो गई.

कमजोर मौर्य साम्राज्य और यूनानी यवन डेमेट्रियस का आक्रमण... 

विदेशी आक्रांताओं विशेषकर यवनों ने इस स्थिति का लाभ उठाते हुए भारत पर आक्रमण करना शुरू कर दिया. शुरुआत में यवन भारत से धन-संपदा और स्त्रियों को लूटकर ले जाते थे, लेकिन जब उन्होंने देखा कि राजा की ओर से उन्हें रोकने वाला कोई भी नहीं है तो उनका साहस और भी बढ़ गया. उन्होंने भारतभूमि पर कब्जा करना भी आरंभ कर दिया. यवन शासक डेमेट्रियस ने तो सारी हदें पार कर दी. डेमेट्रियस भारत की धरा पर काफी अंदर तक प्रवेश कर गया. उसने हस्तिनापुर, इंद्रप्रस्थ से होते हुए कौशाम्बी जैसे इलाकों में भी अपनी आमद दे दी. उस समय मौर्य वंश का बृहद्रथ राजा था. वाणभट्ट द्वारा लिखित महाकाव्य हर्षचरित में उन्होंने राजा बृहद्रथ को प्रतिज्ञादुर्बल कहा है. यानि राजा बृहद्रथ प्रजा की रक्षा करने की अपनी प्रतिज्ञा का पालन नहीं कर पा र

डेमेट्रियस के सैनिक राज्य के बौद्ध मठों में छिपकर रहने लगे थे और राज्य की प्रजा पर जमकर अत्याचार करने लगे थे. राजा बृहद्रथ और उनके पहले हुए दूसरे मौर्य राजाओं की नीतिओं की वजह से सेना अब नाम की ही रह गई थी. ऐसे में इन यवन सैनिकों पर नकेल कसने का माद्दा मगध की सेना में नहीं था. यकीन करना मुश्किल हो गया था कि ये वही मौर्य साम्राज्य था जिसका डंका चंद्रगुप्त, बिंदुसार और अशोक के जमाने में पूरे आर्यावृत में बजता था. जिस साम्राज्य ने सिंकदर और सेल्युकस जैसे योद्धाओं को धूल चटा दी थी वही साम्राज्य अब यूनानी यवनों के सामने हाथ जोड़े खड़ा था.

मौर्य राजा बृहद्रथ की अहिंसक नीति... 

प्रजा की हालत दयनीय होती जा रही थी, लेकिन राजा बृहद्रथ ने डेमेट्रियस को पत्र लिखने के अलावा कोई भी कारगर कदम नहीं उठाया. पुष्यमित्र शुंग उस वक्त मगध साम्राज्य के सेनापति हुआ करते थे. मगध की सेना भले ही कमजोर हो गई हो, लेकिन पुष्यमित्र शुंग का लहू उबल रहा था. पुष्यमित्र को ये कतई बरदाश्त नहीं था कि यूनानी यवनों के रूप में विदेशी आक्रांता उनकी भूमि पर कब्जा करें और प्रजा पर जुल्म करें. पुष्यमित्र से सम्राट बृहद्रथ से कुछ ठोस कदम उठाने को कहा, लेकिन बृहद्रथ के राजकोष में सेना गठित करने के लिए फूटी कौड़ी भी नहीं था. यही नहीं अपनी अहिंसक नीतियों के चलते बृहद्रथ ने अपने सेनापति पुष्यमित्र शुंग को मठों की तलाशी की अनुमति भी नहीं दी. 

सेनापति पुष्यमित्र शुंग हालात के आग घुटने टेकने वालों में से नहीं थे. शुंग ने अपने ही दम पर सैनिकों की भर्ती शुरू की. उसने राज्य के नौजवानों को विदेशी आक्रमण की भयावहता के बारे में जानकारी दी और कहा कि मातृभूमि की रक्षा के लिए वे बिना वेतन के सेना में भर्ती हों. पुष्यमित्र की वाणी इतनी ओजस्वी थी कि राज्य के युवक बड़ी संख्या में सेना में भर्ती होने लगे. सेनापति पुष्यमित्र ने इन्हें सैनिक प्रशिक्षण दिया और अपने दम पर मगध की सेना खड़ी कर ली.

बौद्ध मठों में छिपे हुए डेमेट्रियस के यवन सैनिक... 

इधर बौद्ध मठों में डेमेट्रियस के यवन सैनिकों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही थी. पुष्यमित्र ने राजा बृहद्रथ को स्थिति के जानकारी देते हुए मठों की तलाशी की पुन: अनुमति मांगी. लेकिन राजा बृहद्रथ किसी दूसरी ही खुमारी में खोया था. बृहद्रथ का ख्याल था कि डेमेट्रियस स्वयं हिंसा का रास्ता त्यागकर बौद्ध धर्म की शरण में आ जाएगा. लिहाजा बृहद्रथ ने सेनापति पुष्यमित्र शुंग को अनुमति नहीं थी.

मातृभूमि पर आए गंभीर संकट से देश को बचाने के लिए अब पुष्यमित्र शुंग के पास राजाज्ञा के उल्लंघन के सिवा कोई चारा नहीं था. पुष्यमित्र ने बिना अनुमति के ही बौद्ध मठों की तलाशी का काम शुरू कर दिया. जैसा की उम्मीद थी कि इन मठों में बड़ी संख्या में हथियारबंद यवन सैनिक छिपे हुए थे. इन सैनिकों ने पुष्यमित्र की सेना पर हमला कर दिया. पुष्यमित्र और उनकी सेना पहले से ही इसके लिए तैयार थी. यवन सैनिकों के हमले को नाकाम करते हुए मगध की सेना ने कई यवन सैनिकों का वध कर डाला. 

कुछ वामपंथी इतिहासकार इसी घटना के आधार पर पुष्यमित्र शुंग पर बौद्ध विरोधी होने का आरोप लगाते हुए कहते हैं कि उन्होंने कई बौद्धों की हत्याएं की. हकीकत ये है कि पुष्यमित्र की सेना ने जिस लोगों को मारा वे डेमेट्रियस के यवन सैनिक थे जो भारत की भूमि पर नापाक नीयत से आए थे. 

जारी.... 

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