विजयधर्मसूरि जी की 98 वीं पुण्यतिथि पर पढ़िए समाजसेवी यशवंत जैन का विशेष लेख - शिवपुरी में समाधि मंदिर पर पुष्पांजली अर्पित की - News Adda India

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विजयधर्मसूरि जी की 98 वीं पुण्यतिथि पर पढ़िए समाजसेवी यशवंत जैन का विशेष लेख - शिवपुरी में समाधि मंदिर पर पुष्पांजली अर्पित की

विजयधर्मसूरि जी की 98 वीं पुण्यतिथि समाधि मंदिर में
पुष्पांजली  अर्पित की
                     - यशवंत जैन।
शिवपुरी - विजयधर्म सूरि समाधि मंदिर वीरतत्व प्रकाशक मंडल शिवपुरी के प्रबंधक यशवंत   जैन ने महाराज श्री की समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित करते हुए। श्री विजयधर्मसूरि के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कठियावाढ़ के महुआ में सम्बंत 1924 में शाहरामचन्द्र की धर्म पत्नि से जन्मे तेजस्वी महापुरूष ने जन्म लिया पारिवारिक नाम मूलचंद था। शाह रामचन्द्र के तीन पुत्र व चार पुत्रियों थाी। मूलचंद सबसे छोटे थे। ये बड़े परिवार वाले थे। ग्रह से विरत होकर उनमें दीक्षा लेने का भाग जाग्रत हुआ। वह वृद्धिचंद महाराज के दर्शन कर प्रभावित हुए और चरन कमलों में समर्पित होकर दीक्षा देने की प्रार्थना की। उन्होनें माता-पिता से आज्ञा लेेने की बात कही। पिता ने आज्ञा दी पर माता ने आना-कुनी की मूलचंद्र की आत्मबल की प्रधानता थी। अतः माता को अनुमति प्रदान ही करनी पड़ी। भाव नगर महाराज के पास आकर आज्ञा मिलने का सु-संवाद सुनाया। महाराज ने दीक्षा देना स्वीकार किया। सम्वद 1943 ज्येष्ठ वदी 5 तो इनका दीक्षा संस्कार हो गया उनका नाम श्री धर्मविजय रखा गया। श्री धर्मविजय गुरू भक्ति, विद्या अध्धयन में जुट गये। एक दिन गुरू महाराज की तबीयत ठीक नहीं थी। उन्होंने अपने बडे़ शिष्य से कहा आज व्याख्यान तुम देना पर उन्हें धर्मविजय की फजीयत करवाना अभीष्ट था। इसी उद्देश्य से उन्होंने उत्तर दिया कि धर्मविजय से दिलवाए। गुरूमहाराज ने सुनकर हमारे चरित्र नायक को आज्ञा दी। गुरूकृपा से धर्म ने ऐसा व्याख्यान दिया कि उपस्थित जन-समुदाय वाह-वाह कर बेठे बस क्या था गुरू सेवा और विद्या अध्ययन करने लगे। दीक्षा लेने के बाद गुरू की सेवा में रहना ही अपने धर्म मान लिया। गुरू महाराज की छत्र-छाया रही, कही पर भी अकेले विहार नहीं किया। जब 1945 में गुरू महाराज की आज्ञा से अहमदाबाद में चर्तुमास किया। 1949 में वैशाख सुदी 7 के दिन पुज्यवर श्री वृद्धिचंद्र जी महाराज का स्वर्गवास हो गया। इन्होंने भावनगर ने रहना उचित न समझा और वहां से विहार आरंभ कर दिया। 1950 का चर्तुमास उन्होंने लिम्बड़ी जाकर किया। कष्टोें को सहते काशी पहुंचे बनारस में जगह की दिक्कत किसी प्रकार सूलटोले धर्मशाला टूटा-फुटा मकान मिला। सर्वप्रकार के जीव-जंतु यहां सताने के लिए तैयार थे।मकान गिरा हालत में 9 माह वहां गुजारे नंदन साहू मोहल्ले में एक अंग्रेजी कोठी विकने की चर्चा उनके कानों में आई इस प्रकार की खबर से उन्होंने बम्बई  के सेठ वीरचंद, दीपचंद और दानवीर सेठ गोकुल भाई मुलचंद जी को पाठशाला के मकान की आवश्यकता है। इस बात का उपदेश लिखा। इन लोगों ने उनके आदेश अनुसार वह कोठी खरीदकर पाठशाला के हवाले की। पाठशाला अपने नवीन भवन में चली गई। सारा साधु सम्प्रदाय ,विद्यार्थी खुश हो गये और पाठशाला सुचारू रूप चलने लगी। पाठशाला के भवन में श्री हेमचंद्रा आचार्य के नाम पर श्री हेमचंद्रा आचार्य जैन पुस्तकालय खुल गया। अंग्रेेजी, गुजराती, संस्कृति, हिन्दी आदि भिन्न-भिन्न भाषाओं के प्राचीन अर्वाचीन ग्रंथों का संग्रह होने लगा। गं्रथों का चुनाव और उनकी व्यवस्था करने का कार्य मुनीराज श्री इंद्रविजय जी करते थे। जो लोग जैनों से बात करने में भी पाप समझते थे वे इनके आश्रम में आकर धर्म चर्चा करने लगे काशी की गली-गली में घुम कर जैन अमृतपान इन लोगों ने किया इसकी सुचना काशी नरेश को पहुंच गई। राज  दरबार से भी इसके संबंध में चर्चा शुरू हो गई। काशी नरेश ने मिलने की इच्छा प्रकट की इधर धर्मविजय की इच्छा भी काशी नरेश से मिलने की थी। दिन निश्चित हुआ काशी नरेश ने इनको फिटन तथा नाव दोनों प्रकार का प्रंबध कर इनकी सुचना दी पर ये दोनों ही सवारियां उनके लिए बेकार थी। जो व्यक्ति संसार की समस्त सुखों को टुकरा चुका हो उसे सवारियों से वास्ता ही क्या? यह तो सांसरिक लोगों की वस्तुए है। उन्होंने पैदल जाने का विचार काशी नरेश को सुचित किया। नीयत समय पर वे अपने साधु मंडल और पाठशाला के समस्त विद्यार्थियों को लेकर काशी नरेश के दरवार में पहुंचे। काशी नरेश ने काशी के प्रसिद्ध विद्यवानों और अपने राजगुरू को भी इस अवसर पर निमंत्रित किया था। सभी ने मिलकर धर्मविजय का कम्बल पर बैठ गये काशी नरेश दूसरा पंडित इनसे संतुष्ठ हुए। जैन दर्शन छः दर्शनों में प्रथम है या अंतिम। प्रथम दर्शन मोक्ष होती है, मध्यम से भी होती है। अंत से जिससे मोक्ष होती है वह दर्शन मेरा है इस उत्तर को सुनकर सारा पंडित समुदाय काशी नरेश सहित खुश हो गया। महाराज श्री ने काशी नरेश को श्री यशोविजय पाठशाला आने के लिए कहा उस पर समाचार भिजवाएंगे उस समय में आने का प्रत्यन करूंगा। काशी नरेश का आर्कषण पाठशाला के प्रति उत्तोतर बढ़ता ही गया। काशी में धर्मविजय जी को 2 वर्ष व्यतीत हो चुके थे। पाठशाला का कार्य भी भली प्रकार से चलता था। उनके व्याख्यानों के कारण काशी का जन समाज जैन धर्म से घृणा की वजह प्रेम करने लगा। संम्वद 1962 देश के सर्वमान्य नेता पंडित मदनमोहन मालवीय ने प्रयाग में कुम्भ के अवसर पर सनातन धर्मसभा का आयोजन कर उसमें बड़े धर्म आचार्यों महामहोपध्यायों और विद्यवानों को आमंत्रित के साथ-साथ हमारे चरित्र नायक को भी आमत्रित करने के साथ-साथ हमारे चरित्र नायक को भी खासतौर पर बुलवाया था। उन्होंने निमंत्रण पाकर जैन धर्म के प्रचारार्थ प्रयाग जाना स्वीकार कर लिया और अपने साधु मंडल विद्यार्थि वर्ग के साथ उस ओर चल पड़े यहां पर उन्होंने 10 मिनट का समय दिया गया था। पर उनकी अमृतामय वाणी से श्रोतागण इतने मुग्ध हो गये थे कि वे 50 मिनट बोलते ही चले गये किसी ने रोका तक नहीं। भाषण समाप्ति पर सबने हर्ष व्यक्त किया। भाषण सुन दरभंगा नरेश मुग्ध हो गये बंगले पर बुलाकर सम्मान किया। आर्य समाज क्रिश्यन समाज के बीच उनके भाषण हुए और जैन धर्म कैसा है उसके तत्व क्या रहे बताए इलाहाबाद से बनारस आये कलकत्ते में अहिंसा धर्म का अनवरत प्रचार होने लगा। बंगाली लोगों मंे मस-मास के त्याग का सदेश देते थे। डा. सतीषचंद विद्याभूषण ने जैन न्याय का अध्ययन किया। जैन न्याय और जैन धर्म पर डा. साहब के भाषण दिए। वाणी के सम्पादक बाबू अमूल्य चरणघोष ने भी व्याख्यान किया। कलकत्ते में अंहिसा धर्म का अनवरत प्रचार होने लगा। द्वेष वुद्धि से दूसरों को दूख देना इसी का नाम हिंसा है। बनारस पाठशाला से मुक्त हुए छात्रों ने कलकत्ते मे दीक्षा ली। उनके नाम ंिसंह विजय जी, गुणविजय जी, विद्याविजयजी, महिन्द्रविजयजी और न्याय विजयजी रखा गया। काशी में पंडित समाज ने इनको भारत वर्ष के समस्त विद्वमंडलों की तरफ से यथोचित रूप से सम्मानित करना चाहा इस विचार के अनुसार काशी के समस्त पंडितों ने मिलकर संस्कृत में सम्मान पत्र तैयार कर जिसमें:‘‘शास्त्र विशारद जैन आचार्य‘‘ पद प्रदान किया गया था इस पर काशी के प्रसिद्ध विद्यवानों के हस्ताक्षर किए और उसके बाद कलकत्ता नवदीप, शांतिपुरा, भट्टपल्ली -मिथिला आदि के विद्यवानों के भी इस पर हस्ताक्षर हुए यह पद प्रदान करने श्रावण सुदी 14का दिन नियत हुआ। इसमें काशाी नरेश ने भी चर्चा को सुना तो इनके भी हर्ष का पारवार न रहा उन्होंने पद प्रदान के दिन सभापति का आसन ग्रहण करना और अपने हाथ से इस प्रतिष्ठा पत्र को देना सानन्द स्वीकार किया। इस अवसर पर डा. सतीशचंद्र विद्याभूषण भी खासतौर पर कलकत्ते से आये थे उन्होंने अंग्रेजी में एक अभिनंदन पत्र भी प्रदान किया गया था। काशी नरेश के सामने सूरिजी को उनके अच्छे-अच्छे गुणों से आकर्षित होकर भारत वासी शास्त्र विसारद जैनाचार्य पद भी प्रदान करते है। इस अवसर पर काशी नरेश ने भी युक्ति युक्त उत्तर देते हुए कृतज्ञता प्रकट की। भारत के बाहर के विद्यवानों के शुभ संदेश भी आये। प्रोफेसर हरमन जेकोवी वोन जर्मन थे। मुनिराज धर्मविजय जी के नाम से प्रसिद्वी थी जो आचार्य पद पा जाने के कारण जैन पद्धति के अनुसार शास्त्रविशारद जैन आचार्य श्री विजयधर्म सूरि के नाम पुकारे जाने लगे बनारस में गौशाला न होने खटकने वाली बात हुई गाय घाट पर पशुशाला की नींव पड़ गई। मोतीचंद साहब इसके प्रधान संरक्षक बने काशी नरेश ने भी अच्छी सहायता की बनारस से विहार करते हुए उन्होंने कहा जिस प्रकार हिन्दु धर्म के लिए अंकित है वैसे  ही जैन बौध धर्म के लिए भी है। कहा जाये तो काशी सबकि मौसी है मासी के यहां सब कुछ जाने का अधिकार है। साधु धर्म का पालन कर विचरण जारी रखा उनकी प्रेरणा से लक्ष्मीचंद वेद ने आगरे में पुस्तकालय की स्थापना की उनके उपदेश से शांतिनाथ क्लब और विजयधर्म सूरि जैन मंडल की भी यहां स्थापना हुई। दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गांधी के आव्हान पर भारतवासियों को सहायतार्थ राशि भेजी गई इंद्र विजय जी को उपाध्यक्ष पद। मंगलविजय को प्रवर्तक पद विद्यार्थी वृद्धिलाल को दीक्षा दिलाकर उनका नाम विशाल विजयजी रखा आश्रम में अंग्रेजों के चमड़े के जूते पहनकर जाने से रूकवाया, ब्यावर से जोधपुर पहुंचकर वहां कबूतर मारने को रूकवाया हरवन जोको भी इनसे आकर मिले। उदयपुर में दो दीक्षार्थी को मुनिजयंत विजयजी और मुनिनियान विजयजी रखा। उदयपुर में नवरा़ित्र में अभयदान मिलना चाहिए। पत्र अनुसार महाराणा फतेहसिंह ने 7 भैंसे ,14बकरे का वध करने का नियम बना दिया। आचार्य के उपदेश से हाथी को दरवाजे वाली जैन धर्मशाला में एक जैन पुस्तकालय की स्थापना हुई। बंगाल के बकुला में अकाल की सुचना पाकर महाराजश्री ने वहां सहायता राशि भिजवाई दशाडें के तलाव में मछली मारने को रूकवाया। अमरैली में चर्तूमास कर वहां सनवत्सरी के दिन मास न खाने का निर्णय लिया अमरैली में इनके उपदेश से श्री यशोवृद्धि जैन को वोडिंग और वृद्धिचंद्र जी जैन लाइव्रेरी की स्थापना हुई संवत 1975 जामनगर पहुंचे चर्तुमास किया। संवत 1976-77 में बम्बई में चर्तुमास किया। चीफ लाईवेरीयन डॉ. एफ डब्ल्यू टामस भारतवर्ष आए। बम्बई में रहते उपदेशक तैयार करने की भावना से विजयधर्म सूरि समाधि मंदिर वीर तत्व प्रकाशक मंडल की स्थापना की। ‘विला पारला‘ में यह संस्था स्थापित हुई। यह संस्था में शिवपुरी में ग्वालियर राज्य की छत्र-छाया के नीचे रहकर उस कार्य को कर रही। बम्बई से विहार कर संवत 1978 का चोमासा पश्चिम खांन देश के धूलिया नगर में किया वहां से बिहार का अनेको स्थान पर प्रर्वचन देकर यह स्थान ग्वालियर स्टेट में है। यहां इनका बड़ी धूमधाम से स्वागत हुआ। डॉक्टरों के मना करने के बाद मिलने-जुलने का  क्रम नहीं तोड़ा डॉ. मिलवेन लेवी 29 अगस्त 1922 को मंगलवार के दिन थे। वे महाराज के दर्शनार्थ शिवपुरी पहुंचे सिलवन लेवी 1 सितंबर को वापिस चले गये। महाराज ने शिष्यों से पूछा आज कौन सी तिथि है। आज जबाव मिला भाद्रपद 92 है उनके मुह से निकला की दो दिन की मुसाफिरी और बाकी है। एक शिष्य को आज्ञा दी दूसरा कपड़ा चौल पट्टा लाओं ये मेले हो गये हैं। शिष्य ने पुराने मगर धूले हुए साफ कपड़ा और चॉल पट्टा लाकर हाजिर किया। वे हसे, बोले कि अरे भई अभी दो दिन और पहनूंगा नये ही पहना शिष्य  की आंखों से ऑसू झलक उठे उसने उनको पोछते हुए नया कपडा चॉल पट्टा लाकर हाजिर किये। भाद्रपद सुदी 12 का राई प्रतिकमन सभी साथियों ने किया। प्रतिक्रमण कर उठे तो शरीश की हालत बहुत खराब मालूम हुई। उन्होंने समझ लिया कि यह रोका अंतिम बार है। जब अंतिम विद्यान कर लेना ही उचित हैं यह सोचकर उन्होने अनशन कर लिया 36 घण्टे एक आसन पर अंर्हतों का स्मरण करते रहे। अंत में वह क्षण भी आ पहुंचा जिसकी यह प्रतिक्षा कर रहे थे। एक स्वास उठा उन्होने श्री मंघरमहावीर देव का नाम लिया इसके बाद किसी प्रकार के शब्द नहीं निकले आत्मा हंस स्वर्ग की तरफ चला गया। यह भाद्रपद शुक्ला 14 का दिन था। सूर्य निकलने ही वाला था घड़ी में 6ः30 बजे थे उस समय संसार का यह महान तपस्वी अपने साथियों को छोड़कर परलोक में चला गया और जैन समाज की नहीं सारे संसार की विद्ववन मंडली में एक ऐसी कमी कर गया जिसकी पूर्ति निकट भविष्य में होने की कोई आशा नहीें हैं। महाराज के निधन पर संवेदना सूचक अनेकों पत्रा आचार्य श्री विजेद्र सूरिजी को लिखे हैं। भारतीय विद्यवानों में डॉ. सतीशचंद्र विद्याभूषण, अमूल्यचरणघोष विश्वकवि रविन्द्रनाथ ठाकुर, मोतिलाल छोटालालव्यास, षिनाकी प्रसार, मैथिलीशरण गुप्त, पंडित महावीर प्रसाद त्रिवेदी, जसटिस शारदाचरण मिश्र आदि अनगिनत विद्यवानों से इनका संबंध था उनके लिए तो कोई न कोई तो ऐसी चीज होनी चाहिए जो नित्य उनकी याद दिलाती रहे साथ महापुरूषों के स्मारक स्वर्ग स्थल शिवपुरी में बना है जो समाथि मंदिर और प्रतिमा निर्माण होकर प्रतिष्ठित हुई। उनकी श्रदांजलि सभा व्यापक थी जिसमें देश-विदेश प्रांत, गरीब-अमीर सभी सम्प्रदाय के लोग शामिल हुये।
 श्रीविजयधर्मसूरि समाथि मंदिर वीर तत्व प्रकाशक मंडल ट्रस्ट के प्रबंधक यशवंत जैन ने बताया कि श्रीविजयधर्मसूरिजी के देवलोक गमन के 100 वर्ष सन् 2022 में शताब्दी वर्ष के रूप् में मनाया जायेगा।



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